मजदूर नहीं मालिक है तेंदूपत्ता संग्राहक, ग्राम सभा के पास हो लघु वन उपज का स्वामित्व - Sri Narada News

मजदूर नहीं मालिक है तेंदूपत्ता संग्राहक, ग्राम सभा के पास हो लघु वन उपज का स्वामित्व

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भोपाल।तेंदूपत्ता सहित समस्त लघुवनोपज संघ का स्वामित्व ग्राम पंचायत के पास होना चाहिए, तभी पंचायती राज की कल्पना साकार हो सकेगी। साथ ही ग्रामीणों और आदिवासियों को उनका हक मिल सकेगा। 

यह सुझाव वनवासी कल्याण परिषद ने लघु वनोपज उत्पाद उपार्जन संबंधी वर्तमान नीति में आवश्यक संशोधन को लेकर आयोजित बैठक में दिए। इसमें अतिरिक्त मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव, प्रमुख सचिव वन अशोक वर्णवाल, प्रमुख सचिव आदिम जाति कल्याण पल्लवी जैन गोविल और लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक सूर सिंह राजपूत थे, जबकि वनवासी कल्याण परिषद की ओर से गिरीश कुबेर और जनजाति मंत्रणा परिषद के सदस्य कालू सिंह मुजाल्दा आदि थे। इसमें वनवासी कल्याण परिषद ने 9 सुझाव पेश किए। इसके साथ ही यह मांग भी की गई कि जो भी संशोधन होकर प्रावधान लागू किए जाएंगे, उनको सरल जनजाति भाषा में अनुवादित करवाकर गांव-गांव प्रचार किया जाए।  

यह सुझाव प्रस्तुत किए गए

-फलिया /टोला/ पाड़ा या बस्ती को ग्राम सभा गठित करने के लिए निश्चित प्रक्रिया होनी चाहिए। इसमें उस गांव के मतदाताओं से प्रस्ताव लिया जाए। कलेक्टर द्वारा प्राधिकृत अधिकारी र्ही बैठक ले और गांव की घोषणा राजपत्र में हो।

-पंचायत राज अधिनियम की धारा 129 -इ के   प्रावधान और मध्य प्रदेश अनुसूचित क्षेत्र  ग्रामसभा नियम 1988 के नियम 4(2) व 4(3) हैं, लेकिन पालन नहीं होता है। ऐसे में जनजाति विभाग हर फलिया तक यह जानकारी पहुंचाने के लिए प्रचार मुहिम चलाए। राजस्व विभाग निश्चित समय सीमा में गांव घोषित करे। महाराष्ट्र में गांव से प्रस्ताव आने के 4 महीने के अंदर राजस्व विभाग कार्रवाई करता है, अन्यथा गांव स्वयं घोषित हो जाते हैं। 

-सारे लघु वन उपज का स्वामित्व अधिकार ग्राम सभा के पास होना चाहिए. पेसा के साथ वन अधिकार कानून में भी यह अधिकार दिया है और वन अधिकार कानून धारा 2 में लघु वनोपज की व्याख्या पूरे देश में मान्य है।  इसमें तेंदू व बांस भी शामिल है। अत: मध्य प्रदेश तेंदूपत्ता व्यापार विनिमय अधिनियम 1964 मध्य प्रदेश वन उपज व्यापार विनियमन अधिनियम 1969 यह दोनों कानून में बदलाव कर इन के दायरे से पूरे अनुसूचित क्षेत्र तथा सामुदायिक वन अधिकार प्राप्त अन्य क्षेत्र को मुक्त किया जाए। 

-लघु वनोपज सहकारी सोसायटी व महासंघ आदि जो पुरानी रचनाएं हैं इनको विसर्जित कर ग्राम सभा तथा वनाधिकार धारकों के सहकारी संघ  बनाकर लघु वनोपज का व्यापार तथा परिवहन का ढ़ांचा बनाया जाए। पुराने प्रावधान में जिन्हें संग्राहक माना है उन्हें पेसा और वनाधिकार कानून में मालिक माना गया है।

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